हमारी संस्था द्वारा स्लम एरिया की महिलाओं को हरियाणा की सैर करवाना
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हमारी संस्था द्वारा चलाए जा रहे अवेयरनैस कैंप में स्लम एरिया की महिलाओं ने इच्छा की कि उन्हें हरियाणा की यात्रा करवाई जाये तो बड़ा अच्छा हो वे जानना चाहती थी कि राज्य के खास -खास तीर्थ स्थानों, पुराने आदि को देखने के साथ-साथ वे में जानकारी भी हासिल करना हैं। हमारी संस्था की सदस्यों ने मीटिंग में इस बात की चर्चा की और हम लोगों ने पूरे राज्य की यात्रा का कार्यक्रम बना लिया। हमारे दल में पंद्रह महिलाएं शामिल थी।
यात्रा की शुरुआत अपने शहर हिसार से ही की। उन महिलाओं को शहर के बहुत सारे बाजारों, स्कूल-कालेजों और सिनेमाघरों की जानकारी तो थी, लेकिन कई ऐसी चीजें भी थी जिनकी जानकारी उन्हें नहीं थी। इसलिए हमने सबसे पहले उन्हें उन्हीं चीज़ों से परिचित करवाना उचित समझा। हिसार शहर की भी अपनी एक कहानी है. सबसे पहले हमने उसी के बारे में उन्हें जानकारी दी।
हिसार हरियाणा का एक पुराना और प्रमुख शहर है. इसकी स्थापना 1354 ई में फ़िरोज़शाह तुगलक द्वारा की गई थी। इसका पुराना नाम " हिसार फ़िरोज़ा " या फ़िरोज़ का किला था. फ़िरोज़शाह के महल और किले के खण्डार यहां आज भी मौज़ूद हैं. इनका निर्माण अग्रोहा से लाई गई ईंटों, पत्थरों से किया गया था।
गूजरी महल हिसार का सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक है. फिरोजशाह ने यह महल अपनी प्रेमिका गूजरी के लिए बनवाया था। कहा जाता है कि एक गूजरी दूध देने के लिए रनिवास में आती थी। वह जवां और देखने बड़ी खूबसूरत थी। बादशाह उस पर फिदा हो गये और उससे शादी कर ली. यह महल इसी नई बेगम के लिए बनवाया था। गूजरी के कारण इसका नाम गूजरी महल पड़ा।
इसके बाद सभी महिलाओं ने कृषि तीर्थ हरियाणा विश्वविद्यालय देखा। यह विश्वविद्यालय देश भर में प्रसिद्ध है। कृषि संबंधी खोजों- अनाज, तिलहन,दलहन, फल और सब्जियों
की नई किस्मों, उनकी बीमारियों
तथा उनकी रोकथाम,
कृषि संबंधी उपकरणों
के प्रयोग, खेती की सही तकनीक, गृह विज्ञान, पशु चिकित्सा
आदि की जानकारी ज्ञान, पशुपालन
तथा पशु चिकित्सा
आदि की जानकारी
कृषि वैज्ञानिकों द्वारा
हरियाणा के किसानों
को दी जाती है. विश्वविद्यालय फसलों की बहु -उपज, रोग-कीट -रोधी किस्मों
के बीज तैयार कर आगे बीज तैयार करने के
लिए कृषि विभाग को देता है के लिए क्री विभाग को देता है जो किसानों तक पहुंचाता है।
हिसार के बाद हैम हिसार- सिरसा एसडीके सड़क पर 21 किलोमीटर दूर "अग्रोहा
" पहुंचे। अग्रवाल जाति का उत्पति स्थान और महाराज अग्रसेन की राजधानी अग्रोहा अब टीलों के रूप मेंं विद्यमान है। एक लाख की अाबादी वाला धन-धान्य से भरा-पूरा यैह नगर इतिहास के थपेड़े सहता जला-जुटा और खंडहर हो गया। लगभग 650 एकड़ भूमि मेन फैले इन टीलों के नीचे पता नहीं कितने भवन, कितने खजाने और एतिहासिक मतव के कितने अवशेष दबे पडे. हैं। टीलों पार् पड़ी इंटों और मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों को देखकर हैरानी हुई। हमे उन्हें बताया की अग्रोहा सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से बहुत विकसित था। कहते हैं यह उजड़- उजड़ कर तीन बार बसा। अब इसे चौथी बार बसाया जा रहा है। सिकंंदर, महमूद गजनवी, तैमूरलंग और चंगेज खां जो भी यहां से गुजरा उसने इस सम्पन्न नगर को खूब लूटा। हमने महिलाओं को पुरातत्व विभाग,हरियाणा द्वारा टाइल को खोद कर निकाले गये मंदिर और बौद्धमठ के खण्डहर तथा सती का मंदिर भी देखाया।
हमारा अगला पड़ाव "हांसी" था। महाराज अनंगपाल द्वारा बनवाया किला और चार फकीरों की कब्र पर बनी दरगाह "चार कुतुब" यहां के विशेष देखने योग्य स्थान हैं। चार कुतुब दरगाह पर हर वर्स वर्ष उर्स लगता है. हमने यहां का प्रसिद्ध विष्णु भगवान का मंदिर भी देखा।
इसके बाद हम महाराज इन्द्र के पुत्र जयन्त के नाम पर बसाये नगर जींद के जयन्त मंदिर, भूतेश्वर तालाब अऊर अासपास के अन्य ऐतिहासिक स्थान, जैसे कलायत के मंदिर, रामराय मंदिर, पांडुपिंडारा अादि देखते हुए सफीदों पहुंचे। राजा जनमेजय द्वारा बसाये गये इस नगर को पहले सफीदम कहा जाता था। यहां का ऐतिहासिक तालाब बहुत सुन्दर है। कहते हैं इस तालाब पर हवन -कुण्ड बनाकर महाराज जनमेजय ने नाग जाति को खत्म करने के लिए सर्प-दमन -यज्ञ किया था।
सफीदों से हम अम्बाला पहुंचते हैं किंवदंंती है कि धृतराष्ट्र की माता अम्बालिका के नाम पर इस नगर का नाम "अम्बाला"
पड़ा। कुछ लोग इसकी उत्पति अम्ब वाला यानी अामों वाला से मानते हैं। अब यह नगर
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