
1....तुम क्या पसंद करोगी
क्या किसी सत्यवान की खातिर
तपना पसंद करोगी
रुपकुंवर की तरह आहुती पसंद करोगी
या कोई तीसरा रास्ता पसंद करोगी
यह रास्ता भी कई सलाहों से गुजरते हुये सीधा मृत्य तक पहुँचता है।
मृत्य और जीवन दोनों पुण विराम बने रहते हैं
तुम्हारी आँखों ने वही क्यों चुना जो अलभय है
एक फंदा तैयार है
कहो अपना सिर खुद डालोगी या
हमें मदद को आगे आयें
यहाँ हम सभी को पिसना बखूबी आता है छोरी
धान भी इंसान भी
इस कायनात में तेरी क्या औकात
हमारे पास मुछें, नाक और सता तीनों है
सुन एक चुप हजार सुख हैं सुन ले
और खडी हो जा इस रेखा के भीतर
यही तेरी तकदीर तय होगी
2.....वे रोयी
बेटी सज धज कर ससुराल चली
मौका बेहिचक खुशी का था
पर वो रोयी
देर रात गृहदेवता मदिरालय से लौटे
तब वे उगते सूरज की रोश्नी तक रोयी
दो जून की रोटी की आस में वे रोयी
वे रोती रही और
जीवन की सारी धूमल आशाओं का नमक बहता रहा
पेम आखों से ओझल हो गया दूर
वे फूट फूट कर रोयी
बार बार रोयी
ज़ार ज़ार रोयी
वे हर शोक में रोयी
हर उत्सव में रोयी
इस बार वे इतना रोयी की
जीवन का सारे नदी, नाले पोखर, सीमा-रेखा तक भर आये
पर हर बार की तरह उनका रोना व्यथ गया
वे सीता, दौपदी, अहिल्या,मीरा, सावि बन रोयी,
वे कांता, कमला, शीला बन रोयी
अकारण भी रोयी,
कारण से भी रोयी,
वे रोयी, क्योकि उनहें रोना आता था
अपने सपनों को टूटते केवल वो ही देख सकती थी
तुफान से धवस्त, आगजनी में बरबाद हुये घर को
वे ही दुबारा बना सकती थी।
शायद ये रोना ही उनहें ताकत देता था
कल कोई वै निक उनके आँसुओं को अपने अनुसंधान का
विषय बनाये तो हमें उसका समथन करना चाहिये।
-------Vipin Choudhary
Good Night!
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